Monday, 8 June 2020

रात से बातें (एक)

बचपन के दिनों में एक सपना बार बार आता था | बहुत डरावना सपना | न मैं चीख़ पाता था, न हिल डुल पाता था | लोगों को कहते सुना था की मैं म्य़ार के नीचे नहीं सोना चाहिए | मैं म्य़ार के एकदम नीचे सोता था | अगले दिन मुझे पता होता था आज फिर वही सपना आएगा पर मैं कुछ भी नहीं कर सकता था | मेरा काम था रात भर कॉफ़ खाना | उसे डरावने सपने से | वो सबसे अजीब सपना था क्यूँकी उसका कोई आकार नहीं था, मैं किसी को वो सपना बयाँ नहीं कर सकता था, उसकी शय ही कुछ ऐसी थी | आज भी मुझे उस सपने के अहसास है और आज भी मैं उस सपने को बयाँ नहीं कर सकता | उस सपने से झूझते झूझते में बड़ा होता गया और कई रातों के अभ्यास ने मुझे निशाचर बना दिया | मैं जो सोने के हज़ार प्रयास कर लूँ... पर एक तिहाई रात गुज़र जाती है मज़ाल है नींद मेरे तकिए को छु भी ले | उस सपने की सबसे खास बात यह थी की बड़ा होते होते मेरी जिंदगी में ऐसा कोई खौफ़ नहीं बचा जो मुझे डरा सके | उस सपने ने मुझे तमाम जगती रातें दी हैं, मैं इस फ़िराक में हूँ की रातों को क्या मानू? मैं सोने के प्रयास से थक गया हूँ | मैं सोना चाहता हूँ | क्या प्रेम का प्रयास 'प्रेम' हो सकता है? बिलकुल नहीं | मैं नहीं मानता | प्रेम का प्रयास और प्रेम, दो अलग बातें हैं | टूटने की आवाज़ भी नहीं आती इन दिनों | आहिस्ता आहिस्ता सब बिखर रहा है |

Wednesday, 27 May 2020

छह

मैं बहुत खुश हुआ जब मैंने अपने एकांत में उसे साथ पाया। यह कितना अजीब था | एक साल पहले तक हम अंजान थे एक दूसरे को जानते तक नहीं थे और आज मेरे साथ कोई ऐसा था जिसे मेरी परवाह थी। पहली बार मैं महसूस करता हूँ किसी का होना। ऐसा नहीं था कि मुझे प्यार करने वालों की कमी थी पर कुछेक समय पहले से किसी नए से चेहरे की तलाश थी। वो मुझे मिल गया। हम दोंनो बहुत अच्छे दोस्त बन गए पर कभी एक दूसरे को दोस्त नही कहा। कभी कभी लगता की हमारा रिश्ता अजीब ही होगा। मैं अपनी ज़िंदगी में कुछ अजीब होना सुखद महसूस करता हूँ। वक़्त के साथ हम इतने करीब हो गए कि एक दिन मैंने उसकी गोद में सर रख दिया और उसे कहा कि मुझे ज़ोर की नींद आ रही है। मैंने अपने अंदर छिपे तमाम राज़ उसे कह दिए। और फिर अचानक वो गायब हो गई..मैं छटपटा उठा, इतने इंतज़ार के बाद अभी तो वो मिली थी और कितनी और बातें उसे कहनी थी। फिर अचानक मुझे लगा की मैंने यह सब उसे क्यों कहा। क्या वो मेरी दोस्त है? प्रेमिका तो नहीं ही है, हाँ लगाव है शायद वो भी मेरे ही कारण। यह मैंने क्या कर दिया, कैसे अपने भीतर छिपे राज़ उसे कह दिए। क्या मैं हमेशा से ऐसा हूँ कि कोई मेरी परवाह करे या मुझसे लगाव रखे तो बिना उसे जाने समझे मैं उसे वे सब बातें कह दूंगा जो मेरे भीतर है। पर मैंने किसी और को भी तो कभी नहीं कहा सिर्फ उसे ही तो कहा। शायद परेशानी भी यही है कि उसे ही क्यों कहा। मैं हर मायने में उसे सोचता हूँ। ख़ुद को गलत ही पाता हूँ। शायद इस वज़ह से क्योंकि सभी शुरुआत मैंने ही की है। उसने कभी मेरी तरफ कदम नहीं बड़ाया। मेरा ही रुख़ उसकी और था। क्यों?, मैं ऐसा क्यों हूँ?, क्या सभी ऐसे है?, मतलब इस पूरी दुनिया में, कितने लोग है अनेकों चेहरे पर कोई एक ही आपकी स्मृति में बार बार क्यों आ जाता है? तब भी जब आप न चाहते हों। दरअसल, कभी कभी यह चाहना समझ नही आती। क्योंकि अगर वो आपकी स्मृति में है तो वो आपकी चाहत ही है। अब मैं एक रहस्य में उलझने लगता हूँ.. मैं उसके अलावा दुनिया की तमाम चीज़ों की कल्पना करता हूँ पूरे ब्रह्माण्ड को सोचता हूँ। उसकी व्यापकता को सोचता हूँ। हममें से कोई भी न के बराबर है। और किसी के होने से कोई फर्क़ शायद पड़ता होगा। ख़ुद में इस बारे में कुछ महसूस नही करता। फिर अचानक से वो मुझे छोड़कर जाने लगती है। मैं चीख़ने लगता हूँ आवाज़ नही निकलती। खट खट की आवाज़ लगातार मेरे कानों में गूँजती रहती है। मैं नींद से जागता हूँ। और मेरी ज़बान से निकलता है "यह क्या हो गया।", "जबकि कुछ हुआ ही नहीं।"

पाँच

"हम दोनों के बीच जो रास्ता है उसे भी तो हम दोनों ही समझ नहीं आते |" कल रात उससे बात शुरू ही की थी अचानक रुक गया। मन हुआ की अब कभी बात नहीं करूं। फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों सोचता हूँ? मतलब हम ख़ुद से भागकर कहाँ जायेंगे? और क्या ऐसे रास्ते बने भी है जिन्हें पार कर हम अपने से भाग जाएं। मैं तो सृजन की प्रिक्रिया में हूँ यानी ख़ुद को ढूंढ ही रहा हूँ। ख़ुद से भागना तो ख़ुद की तलाश नही होती शायद। कभी कभी अपनी यह मनोस्थिति समझ नहीं आती क्योंकि यह ख़ुद में विरोधाभास लिए हुए है। चाहने न चाहने का, भागने न भागने का, छुपने न छुपने का और हर तरह का। बहुत सोचने के बाद मुझे पता चला की मुझे किसी से भी डर नहीं लगता, किसी से भी। यह कुछ गलत सा अहसास है डर का न होना। कभी कभी लगता है कहीं मैं ठीक के आस पास तो नहीं। ओ शिट... मुझे ठीक शब्द से तो भयानक चिढ़ है जब मैं इसके आस पास भी कहीं होता हूँ तो लगता है की ख़ुद को डुबो दूं क्योंकि ये सुस्त सा अहसास दिलाता है। मैं आर या पार की लड़ाई लड़ना चाहता हूँ एक ही पल में, हमेशा। चाहता हूँ की तेरे लिए जब भी लडूं ख़ुद को तो हार ही जाऊं इस तरह बार बार हारना भी तो हर बार की बैचेनी है। शायद, बार बार या हर बार और कभी कभी का आना भी तो ठीक के आस पास कहीं होगा। मैं फिर से वहीं आ गया जहाँ खड़ा था यह क्या विडंबना है? कहीं ऐसा तो नहीं की हम दोनों में से कोई एक रहस्य हो अज़ीब सा या पहेली? मैंने जब उससे इस बात का ज़िक्र किया वो कहती है -"आप मुझे समझ नहीं आते।", "मुझे भी वो कहाँ समझ आती है", और हम दोनों के बीच जो रास्ता है उसे भी तो हम दोनों ही समझ नहीं आते। "दोनों न समझ है !"

चार

'वह' जब भी मेरी कल्पना में आती वह शांत सी स्थिर सी, ठहरी हुई नज़र आती। मैं अपनी कल्पना में उसके ठहराव का प्रेमी हूँ। पर असल जिंदगी में, मैं चलना चाहता हूँ और कभी कभी बेबज़ह, बेतहाशा भागना चाहता हूँ। कल्पना से मेरा रिश्ता यह है की वह सबसे पहले जीवन में आती है। पर असल में, मैं जीवन को आगे रखता हूँ क्योंकि मुझे चलना बहुत पसंद है। फिर चाहे मुझे किसी थामे हुए हाथ को छोड़ना पड़े। मैं सिर्फ़ उसी साथ को चाहता हूँ जो असल में चल सके। ठहराव कल्पना के बाहर बेहूदा लगता है। जीवन में ठहराव को नहीं जिया जा सकता। इसीलिए अक़्सर मैं अकेला चल पड़ता हूँ। बेपरवाह।

तीन

उस वक़्त को मैं अपनी ओर आते देख रहा था जो मेरा अपना नहीं था। वक़्त को मैंने जीवन से उधार लिया था बदले में वादा किया था कि मैं अपना जीवन उसे दे दूंगा। पर मुझे उधारी पसंद नहीं है इसलिए मैंने वक़्त को वक़्त लौटा दिया और अपने हिस्से का अकेलापन वापस ले लिया। क्योंकि अकेलेपन की गोद में बैठकर मैं ख़ुद को ज़्यादा खोज लेता हूँ। ऐसा नहीं है की ख़ुद को खोजे जाने के लिए हमेशा अकेला होना ज़रूरी है पर यह ज़रूरी है की जिसके साथ आप जीवन को खोज रहे हो या जो उस वक़्त आपके साथ है- वो ईमानदार हो। क्योंकि भरोसे पर ही तो दुनिया टिकी है। वक़्त और मेरे बीच जन्म से ही यह भरोसा कायम है तभी तो जब चाहे मैं अपने जीवन से वक़्त को उधार मांग लेता हूँ और वो मुझे मेरे अकेलेपन से दूर ले जाता है। मैं तुमसे उतना ही साथ मांग रहा हूँ जितना लौटाया जा सके। उससे तनिक भी ज़्यादा नहीं |

दो

मैं जब अपने घर से निकला तो माँ की आँखों में देख रहा था । वो चाहती थीं की विरासत में मुझे इतना कुछ दे सके की ज़िन्दगी में मुझे कभी कोई तकलीफ़ न हो । मैंने कभी माँ से कहा नहीं पर मुझे उसकी लगन हमेशा दिखती थी और मैं उसे कहना चाहता था की विरासत में यह जो मुझे मिल रहा है वो सबसे बड़ा है । यह इतना भी हो सकता है की मैं दुनिया की कोई भी बाजी जीत सकता हूँ । पापा की ज़िद रहती है की वो हमेशा मुझे कुछ दे सकें। मेरे लिए कुछ कर सकें और एक किस्म की शिद्धत  हमेशा उनके भीतर रही है। आज कल में पता नहीं ऐसा क्या घट गया की महसूस हो रहा है की विरासत में वही शिद्धत मुझे मिल गई है । जिसके बूते मैं दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकता हूँ । मुझे अपने काम करने की शिद्धत पे घमंड हो गया है । मुझे अपने प्यार करने की शिद्धत पे घमंड हो गया है । घमंड और अकड़ बहुत विशेष लोगों में होती है। जिनके पास जीतने का जज़्बा होता है वही तो छाती ठोककर कह पाते होंगे की वे किसी दिन कर दिखाएंगे। मुझे जो चाहिए था शायद मिल गया है । मुझे विरासत में कोई धन दौलत या कोई भी भौतिकी तो कभी चाहिए ही नहीं थी । यही शिद्धत चाहिए थी जो है मुझमें । लेकिन कुछ है जो इस वक़्त मेरे भीतर बिखर गया है। जिसे समेटना मेरे अकेले के बूते की बात तो नहीं है। क्योंकि वो बिखरा हुआ मेरे अकेले का नहीं है । अपनी शिद्धत को मैं संभाल लूँगा पर मेरा घमंड नहीं टूटना चाहिए । मेरी अकड़ नहीं मरनी चाहिए । मैंने अब तक किसी भी असीम शक्ति पर भरोसा नहीं किया है लेकिन अगर वो है तो आज एक गुज़ारिश है उससे की अब से मैं अपनी शिद्धत को ही पालूँगा । पर जो बचाए रखना है वो बचा रहे । क्योंकि घमंड नहीं टूटेगा अगर कुछ टूटेगा तो वो मैं हूँ। शायद ये जीवन के सन्दर्भ में तो नहीं ही है। क्योंकि जीवन के हर उतार चढ़ाव को मैं बस जीना चाहता हूँ । यही मेरे जीवन की जीत है । और अपने सपनों के लिए भी घमंड या अकड़ का होना स्वाभाविक सा नहीं है । फिर ऐसा कुछ है जो न कहा जा सकता है, न लिखा जा सकता है !!  ये होना ठीक है या नहीं पर तय है । प्रेम पंख फैलाए मेरे कंधे आ बैठा है । पर उसका भार कभी कंधे पे महसूस नहीं होता । समझ नहीं आता की वो उड़ चुका है, बैठा है,  उड़न चाहता है या बैठना चाहता है । मैं तुम्हारा भार हमेशा अपने कंधे पर महसूस करना चाहता हूँ |

एक

बचपन में बड़े बड़े किस्से होते थे आस पास। मैं बेतहाशा भागना चाहता था। फिर, किस्से इसलिए सुनाए जाने लगे ताकि मैं भाग न सकूं। मेरे अंदर किस्सों का डर गहराता गया पर कभी मैं डरा नहीं। स्कूल के दिनों में जब सब लोग अपने घर वालों को याद कर करके रोते थे तब मैं रोया नहीं। वो सारे आँसू क़ैद हो गए । आँसूयों के क़ैद हो जाने से त्रासद कुछ नहीं होता।मेरे हिस्से आए लोगों ने कभी खुलकर प्यार जताया और खुलकर दूर छिटकने लगे। मैंने उन्हें जाने दिया। मैं सिमटते सिमटते अकेला होने लगा। एक बात जो हमेशा मैं कहना चाहता था पर कभी किसी से न कह सका। माँ से, पिता से, परिवार से, दोस्तों से, प्यार से कि वो मेरे लिए सबसे ज़्यादा महत्व रखते हैं। मुझे लगा की यह कहा नहीं जाना चाहिए। बस सिर्फ इस बात की चुप्पी हमेशा खलती है। मैं भगौड़ा था, पैदाइशी भगौड़ा। मैं अपनी नाकामियों, कमज़ोरियों से हमेशा भागा ठीक उसी तरह लोगों से नहीं भाग पाया। किस्सों की गंभीरता, आंखों में क़ैद आँसू, चुप्पी और एक भगौड़े की नाकामी दिन-व-दिन बढ़ रही है।

Monday, 11 May 2020

खेल

लॉकडाउन में PubG खेल कर काफी वक़्त बीत जाता था पर आज दूसरा ईयरफ़ोन भी ख़राब हो गया | दुकानें खुलती नहीं है, छोटी छोटी समस्याएँ असल में बहुत बड़ी होती हैं | मन की स्थिरता कैसे लौटेगी आजकल यह बिलकुल समझ नहीं आता | घर में पड़े पड़े कई दिन बीत गए हैं अभी और कितने ही दिन बीतना बाकि है | लिखने की बहुत कोशिश के बाद भी कुछ लिखा नहीं जा रहा है, न पड़ा, न कुछ नया देखा बहुत दिनों से | जी भर के बस वीडियो गेम्स ही खेलें हैं | जब सब कुछ स्थिर हो जाता है, तब सब सहज नहीं रहता, सहज रहने के लिए चलना कितना ज़रूरी है इसका आभास हो गया है इन दिनों | PubG असल में हैं कमाल का खेल | इस बहाने दोस्ती गहरी हो जाती है |

Sunday, 26 April 2020

फितरती अतीत

रिया अलहदा पागल है | एक दिन अनजाने नम्बर से एक लड़की का फ़ोन आया उसने मुझे एक दुखभरी कहानी सुनाई | लिहाज़ा मैं पहली बार किसी ऐसी लड़की से भिड़ रहा था सो मैंने उसे कंधा दे दिया | उसने कहा की क्या हम दोस्त हो सकते हैं? इसमें अचरज तो कुछ था नहीं, मैंने हाँ बोल दिया | दूसरे दिन बात पसंद तक आ गई | दो चार दिन बीतें होंगे और उसने प्रोपोज़ कर दिया | कुछ दिन मैंने टाला |असल में मैं भी किसी के प्यार में पढ़ना चाहता था पर हमारी frequency कतई मैच नहीं कर रही थी, सो मैंने उसे रिप्लाई करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं की | मैंने बस उसे यह विश्वास दिलाया की अपने पास्ट से बाहर निकलने में अगर उसे लगता है की मेरी ज़रूरत है, तो अपने अकेलेपन में मुझसे बात कर सकती है | गुरु पास्ट तो हमारा भी है पर रोना गाना किसी के सामने नहीं किया | सिवाय एक दोस्त के वो भी इसलिए क्यूंकि वो जिगरी है | और जिगरी यार तो जिगरी होते हैं, वो होते ही इसलिए हैं की हम उनके सामने रो सकें | और आखिरकार मुझे समझ आया की उसका रोना फितरती है, जो बिलकुल मेरे बर्दास्त के बाहर है | मैंने उसे सॉरी कहा और किसी भी किस्म का रिश्ता न रखने की बात कही | क्यूंकि असल में, मैं उनकी बिलकुल मदद नहीं कर सकता जो खुद अपनी हेल्प नहीं चाहते | चंद रोज़ पहले कइयों बार उसके कॉल आने, इज़हार करने के बाद आखिरकार यह किस्सा भी तमाम हुआ |  

न हुई तब्दीली

सीमा से मैं हमेशा कहना चाह रहा था की मैं असल में वो नहीं हूँ जिसे वो तलाश रही है | वो कभी कभार कोशिश करती रही और अपने खाली वक़्त में, मैं उसे कभी कभार बात| दोस्तियाँ आजकल बहुत अस्थिर होती हैं या होती ही नहीं हैं | जब उसने मुझसे बातचीत थी, मैं समझ गया था वो मुझे पसंद करती है | किस्सा पसंद या प्यार से शुरू हो तो औंधे मुहँ गिरता है | कुछ दिनों बाद न नुकुर करते हुए उसने एक दिन कह दिया की वो मुझे पसंद करती है | मैंने कहा जाने दो | बाबजूद एक दिन उसने मुझे प्रोपोज़ कर दिया | उस वक़्त मैंने यह कह कर की मैं दूर दराज़ रहने वालों के प्यार में नहीं पड़ता मैंने टाल दिया और मैं टालता रहा | टालना कभी किसी निर्णय तक नहीं ले के जाता | किसी एक को तो आगे चलना होता है अक्सर मैं यह गलती करता हूँ सो चंद रोज़ पहले हर तरह से मैंने उसे ब्लॉक कर दिया | प्रेम और पसंद असल में दोस्ती में तब्दील हो यह वाकई मुश्किल है | दोस्त दोस्त की तरह मिलना चाहिए | 

Saturday, 18 April 2020

दिन

पिछले दो तीन दिन से बहुत कोशिश के बाद भी न कुछ लिख पा रहा हूँ न पढ़ पा रहा हूँ | सिनेमा देखना तो हो जाता है, पर कल एक फिल्म शुरू की थी जिसे देखते देखते आधे में ही मन ऊब गया | सोचा था लॉकडाउन के चलते बाहर नहीं जा सकते इस बहाने लिखना पढ़ना हो जाएगा | मन स्थिर होने की जगह और बहक रहा है | सिग्रेट की डिब्बी में आख़िरी सिगरेट बची है | कॉफ़ी भी आज पीने की इच्छा नहीं हुई | 

बहुत ज़द्दोजहद हो गई लेकिन फिल्म लिख पाना नहीं हो पा रहा है | इस साल हर हाल में एक फिल्म बनानी है जो पुरानी स्क्रिप्ट लिखी पड़ी हैं काफ़ी पेचीदा है और उनमे तामझाम भी है | सरल लिखना इतना कठिन क्यों होता है? बहरहाल, सरलता के पायदान तक हर हाल में पहुंचना है | ख़ुद को काबिल एनर्जी देते रहना है फिल्म तो मक़सद है, ज़िंदगी है उसके अलावा तो मैं कुछ नहीं | कैसे कोई कहानी मुझ तक पहुंचेगी, कैसे मैं कहानी तक रास्ता इख्तियार करूंगा पता नहीं | करना है, हर हाल में करना है बस | 

दरमियाँ, हमारे पहले गाने का म्यूजिक ऑलमोस्ट तैयार हो गया है | आशीष भाई खूब मेहनत कर रहे हैं संगीत बनवाने पे | अभी रफ़ कट भेजा था, पसंद आया | अब उसके वीडियो मेकिंग और कास्टिंग से जुडी ज़रूरतों पे काम करना है | एक अच्छी मार्केटिंग टीम ने चैनल के प्रमोशन पे काम करना शुरू कर दिया है | उम्मीद है, हमारा तुरुप हमारे लिए सही शाबित हो |

Monday, 6 April 2020

सन्नाटे का शोर

सिगरेट, कॉफ़ी और डायरी लेकर सीढ़ियों पे बैठ गया आज, जब से लॉक डाउन हुआ है कमरे के कोने में पड़े पड़े बेतहाशा बोर हो गया था | लगातार लिख रहा था, फ़िल्में देख रहा था, आजकल पड़ने का मन नहीं है | पिछले दो दिनों से लाइव गेमिंग के बहाने दिल बहला रहा हूँ | काम ही जो मुझे ज़िंदा रखता है | दोनों रूममेट अपनी प्रेमिकाओं के साथ मसगूल हो जाते हैं | अपनी जिंदगी में कोई ख़ास जैसा नहीं है, जिससे बात की जा सके इसलिए इन दिनों बोरियत ज़्यादा रहती है | बीती रात एक निर्णय तो कर ही लिया था जिसपे पिछली पोस्ट लिख दी है अब और उसके बारे में नहीं सोचूंगा | पड़ोस में एक अंकल रहते हैं | मुस्लिम हैं, बड़ा ही नेक दिल है | मैंने अब तक उनका नाम नहीं पूछा | अक्सर आते जाते जब भी टकराते हैं, ख्याल पूछते हैं | लॉकडाउन से पहले से कह रहे हैं पैसे ले जाओ और घर जाओ | ज़रूरत हो तो कह देना, कभी भी कितने भी पैसे की | मैं हाँ कह देता हूँ मगर मुझे कभी इतनी पैसो की ज़रूरत नहीं होती की किसी से लेने पड़ें | बहुत सिमटे हुए खर्चे में जीवन चलता है | काम के अलावा किसी चीज़ से गहरी दिल्लगी नहीं है | 

सिगरेट मिलना बंद हो गया है, जैसे तैसे कहीं से दो पैकेट - वो भी तीन गुना कीमत पे ले ली हैं | एक पैकेट तो ख़त्म भी हो गई है | पूरी दुनिया को कोरोना खा रहा है | हलक तक उसके गले में लोग हैं | मुंबई में गहरा सन्नाटा है, सुर्ख़ चुप्पी बिछी है आस पास, कहीं कोई हलचल नहीं | सारे सोशल मीडिया के यूज़ से तो बुरी तरह पक गया हूँ | पता नहीं क्यों पर इस दौरान स्क्रिप्ट लिखते ही नहीं बन रही है, कभी एक सीन ऐड करता हूँ तो कभी एक डायलॉग | कहानी संग्रह अधूरा पड़ा है | कविता संग्रह एक चौथाई ही पूरा कर पाया | फिल्म का सपना तो दूर कहीं अंगड़ाई ले रहा है | अगले तीन महीने तो अब शूट की कल्पना ही बेकार है | कितने कुछ है दुनिया में लड़ने झगड़ने और सोचने विचारने को पर मन बार बार किसी के प्यार में पड़ जाने को हो रहा है |    

Saturday, 4 April 2020

वासना की दरार

मीरा, मुझे उसने अपना नाम यही बताया था | इसके आगे-पीछे, घर-बार, शायद मैं कुछ भी नहीं जानता उसके बारे में | सन 18 के दौरान एक दिन पहली बार मैसेज आया था उसका, फेसबुक मेस्सेंजर पे | मैं बड़ा एक्टिव हूँ, और रिस्पॉन्सिव भी बहुत, उससे छुट पुट बात शुरू हो गई | न कभी हम मिले थे, न एक दूसरे को जानते थे | वो अपने किस्म की सारी छानबीन कर चुकी थी | सब जानती थी मेरे बारे में, मतलब भोपाल के दिनों का पूरा लेखा जोखा था उसके पास | वैसे मेरे बारे में कुछ भी जानना बहुत मुश्किल नहीं है, हर सोशल मीडिया पर ऑलमोस्ट सब पड़ा है | बातों बातों में उसकी दिलचस्पी तो समझ आ गई थी | पर कुछ भी कहने से डर रही थी | सो मैंने उसे थोड़ा कुरेदा | जिस दिन मैंने कुरेदा तो न नुकुर करती रही | फिर अगले दिन कॉल करके बोली की 'वो मुझे पसंद करती है', यह अपनी ज़िंदगी में पहली बार था | कोई लड़की खुद से, इतनी छान बीन करके यह बोलने वाली थी | अनएक्सपेक्टेड, ऐसा भी होता है क्या? मन में थोड़ी गुदगुदी हुई | सख्ती दिखाने  के लिए अपन को कोई कोशिश नहीं करनी पढ़ती, अंदरूनी है अपने भीतर | अब सवाल आता है दिखती कैसी है? यह बात अपने लिए अब तो मैटर करती थी | मैंने कहा की वो अपने फोटोग्राफ्स भेजे | फिर उसने न नुकुर करना शुरू कर दिया | "यार पता नहीं मैं कैसी दिखती हूँ? तुम क्या सोचोगे मेरे बारे में? फलाना ढिकाना ! मैंने कहा 'Listen, I'm not in love with you. तो ज़ाहिर है मैं तो सोच ही नहीं रहा हूँ कुछ | उसने तस्वीरें भेजीं  और अपन को पसंद नहीं आईं | मैंने कहा, प्यार व्यार तो नहीं हो पायेगा, पर लगता है तो जुड़ी रह सकती है, कभी कभार बातचीत कर सकती है | और अपनी तरफ से चैप्टर क्लोज हो गया | 

लगभग सालभर बाद भोपाल गया तो न जाने कैसे मैंने मीरा को मैसेज कर दिया | थोड़ी देर बात हुई और उसने मुझे 'I love you' बोल दिया | मेरे लिए ये तो और भी ज़्यादा अनएक्सपेक्टेड था | हमारी तो बातचीत भी नहीं हो रही थी | साल भर पहले भी हमारी गिनी चुनी बातें हुईं थीं | पर पहली बार कोई इज़हार करे, आत्मा तृप्त हो जाती है | अपने लिए ये पहली बार था, इससे पहले तो दिल ही दुख था | बहरहाल, मैं अकेला ही था तो मैंने उसे मिलने का ऑफर दिया | मैं उसे समझाना ही चाहता था की असल में उसे कोई और मिल जायेगा, मुझे उसके साथ वो वाइब्स ही फील नहीं हुई थी जिसका होना ज़रूरी था | मैं महसूस कर चूका था की मैं कभी उसके प्रेम में नहीं पढ़ सकता | 


जो भी हो दो घण्टे बाद वो मिलने चली आई | थोड़ी देर यहाँ वहाँ की बात हुई, चाहे उत्सुकता रही हो या सोशल प्रेशर, मैंने उसके सामने सेक्स का प्रस्ताव रख दिया और वो न भी न कर पाई | उसके बाद मुझे अजीब सी खीझ हुई | मैंने उसके और मेरे प्यार में पड़ने की नीव डाल दी थी | रात को उसका मैसेज आया, तुमने मुझे न कॉल किया न मैसेज? जैसे तैसे मैंने बात को जाने दिया | अगली सुबह मेरे जागने से पहले ही उसका मैसेज आ गया की वो फिर से सेक्स करना चाहती है | मैंने उसे कंडोम साथ लाने को कहा | इच्छाएँ आपको गहरे में डुबोती हैं | मुझे पता था की एक दो दिन बाद उस पर कहर टूटने वाला है, पर न मैं खुद को रोक सका न उसे |  


मैं बॉम्बे वापस आ गया | एक दो दिन बात हुई और उसे लगने लगा की मैं उसके लिए बिलकुल सीरियस नहीं हूँ | बर्दास्त करने की क्षमता, और सच के परिणाम का डर कभी रहा नहीं सो मैंने उसे कह दिया की मैंने उसे पहले ही कहा था की मैं उसके प्यार में नहीं हूँ | हो सकता हूँ? पर इस वक़्त मैं कन्फर्म कर रहा हूँ की मुझे उससे कभी प्यार नहीं हो सकता | फिर मेरे हिस्से चार छै खरी खोटी बातें आईं | अफरा तफरी में उसने मुझे ब्लॉक कर दिया | और मुझे लगा की किस्सा ख़त्म हो गया | मुझ खुद से थोड़ी घृणा हुई | जाने अनजाने 'यूज़ एंड थ्रो', वाली बात हो गई थी | मैं इतना बुरा हो गया था मुझे इसका अंदाज़ा अब लगा | 

छै आठ महीने गुजर गए, मैंने उसे इस बार सिर्फ दोस्ती का प्रस्ताव दिया | पर प्रेम का अंत कभी दोस्ती नहीं हो सकती | अब तक का लेखा जोखा यही है | दुःख इस बात का उसकी चाह के बदले उसे कुछ दे न सका | और मैंने खुद को वहां शुमार कर लिया जहाँ मैं कभी नहीं होना चाहता था | एक दिन उसके हिस्से कोई कमाल का प्रेमी आए | वो मेरे हिस्से आई सबसे पहली समर्पित प्रेमिका थी | मेरे जीवन में यह उसका हिस्सा है | 

Friday, 3 April 2020

लेने के देने

ब्लॉग पर एड लगाने के चक्कर में पूरी साईट का HTML गड़बढ़ हो गया और लेने के देने पढ़ गए | पूरा ब्लॉग दोबारा डिज़ाइन किया सारे पोस्ट लिखने पड़े और अब ब्लॉग को customise भी करना है | मैं भी पता नहीं क्या क्या फालतू चीज़ें एक्स्प्लोर करने लगता हूँ | अब वक़्त जाया नहीं करूंगा | इस बार सीख लिया है | अपने काम से काम रखो ज़्यादा एक्स्प्लोर मत करो नहीं तो लेने के देने पढ़ जाते हैं | अब पता नहीं डोमेन का DNS कनेक्ट होगा की नहीं | चलो, हाथ पैर फेंको धर्म बाबू, फिर से सारा तामझाम खड़ा करना है | 

अतीत से अब तक


2017 में ब्लॉग शुरू किया था | 18 के जून तक पहला कविता संग्रह आ गया था | ब्लॉग के थ्रू गया तो देखा 19 में एक शब्द भी नहीं लिखा गया | 19 भोपाल से बम्बई में शिफ्टिंग की ज़द्दोजहद का समय रहा पर इतना समय भी नहीं लगता | ज़्यादा कोशिश 'रोल' हासिल करने की कोशिश में बीता | अंततः सारी कोशिश बेबुनियाद रही लेकिन इतना तो है की वो सारे रास्ते पता चल गए जिन पर नहीं चलना है | नोटबुक का निर्माण भी 18 की बात है | 20 का चौथा महीने लगने वाला है अब फिर से कोशिशों का रुख उसी तरफ मोड़ना है जैसा भोपाल के दिनों में था | कितना सारा थिएटर, लेखन, फिल्म निर्माण, अभिनय सब कर लेता था | पिछले साल बम्बई में खाली ज़्यादा गुज़रा और काम काम किया | नीरज पांडेय निर्देशित 'Special Ops' रिलीज़ हुई है कुछ समय बतौर कास्टिंग असिस्टेंट उसमे काम किया था | कुछ समय बाद उसे भी बीच में छोड़ दिया और अच्छा हुआ | देर आय दुरुस्त आये, समझ तो आया क्या नहीं करना है | पिछली जुलाई के दौरान 'धीरज मिश्रा' एपिसोडिक सीरियल 'वीर क्रांतिकारी' में अभिनय किया था पर उसकी झलकियां देखी नहीं | पर इस साल मार्च में अमित सैनी सर ने क्राइम अलर्ट के एक एपिसोड में कास्ट कर दिया | एक मिनट का एक ही सीन था मेरी करने की मंशा तो नहीं थी पर सर को मैं न कह न सका | घर में सबने एपिसोड देखा | सब खुश थे | मैंने भी खुद की पहली बार टीवी पर झलकियां देखीं | स्क्रीन पे होने की ख़ुशी सचमुच अलग होगी | अभी वो रास्ता जितना सोचा है उतना इख्तियार करना है | फरवरी अनुभवों से भरा हुआ रहा | रिलायंस मार्किट के एक कमर्शियल में बतौर कास्टिंग एसोसिएट और असिस्टेंट डायरेक्टर भी जुड़ा रहा | असिस्टेंट डायरेक्टर के काम का यह पहला अनुभव था | बहरहाल इस साल की शुरुआत खूबसूरत हुई है | काम की भी शुरुआत बन रही है | अच्छे लोगों से वास्ता भी पढ़ रहा है और अपना काम भी मैंने नए सिरे से शुरू कर दिया है |

उम्मीद की चाल


फरवरी में थोड़ा काम से वास्ता पढ़ रहा है | चार (तारीख़) को लगभग प्रोजेक्ट शुरू हुआ था और 20 तक चला | पूरी एनर्जी एक एड में लगी रही फिर भी यहाँ के लोग पैसा देने में बहुत रोना गाना करते हैं | अगर सच में प्रोफेशनल लोगों से वास्ता नहीं पड़ा तो बॉम्बे में ज़िंदगी की जद्दोज़हद बढ़ जाएगी | स्क्रिप्ट अब भी अधूरी है जल्द पूरी करना है | फिल्म का सपना अभी बाक़ी है |