'वह' जब भी मेरी कल्पना में आती वह शांत सी स्थिर सी, ठहरी हुई नज़र आती। मैं अपनी कल्पना में उसके ठहराव का प्रेमी हूँ। पर असल जिंदगी में, मैं चलना चाहता हूँ और कभी कभी बेबज़ह, बेतहाशा भागना चाहता हूँ। कल्पना से मेरा रिश्ता यह है की वह सबसे पहले जीवन में आती है। पर असल में, मैं जीवन को आगे रखता हूँ क्योंकि मुझे चलना बहुत पसंद है। फिर चाहे मुझे किसी थामे हुए हाथ को छोड़ना पड़े। मैं सिर्फ़ उसी साथ को चाहता हूँ जो असल में चल सके। ठहराव कल्पना के बाहर बेहूदा लगता है। जीवन में ठहराव को नहीं जिया जा सकता। इसीलिए अक़्सर मैं अकेला चल पड़ता हूँ। बेपरवाह।
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