Wednesday, 27 May 2020

एक

बचपन में बड़े बड़े किस्से होते थे आस पास। मैं बेतहाशा भागना चाहता था। फिर, किस्से इसलिए सुनाए जाने लगे ताकि मैं भाग न सकूं। मेरे अंदर किस्सों का डर गहराता गया पर कभी मैं डरा नहीं। स्कूल के दिनों में जब सब लोग अपने घर वालों को याद कर करके रोते थे तब मैं रोया नहीं। वो सारे आँसू क़ैद हो गए । आँसूयों के क़ैद हो जाने से त्रासद कुछ नहीं होता।मेरे हिस्से आए लोगों ने कभी खुलकर प्यार जताया और खुलकर दूर छिटकने लगे। मैंने उन्हें जाने दिया। मैं सिमटते सिमटते अकेला होने लगा। एक बात जो हमेशा मैं कहना चाहता था पर कभी किसी से न कह सका। माँ से, पिता से, परिवार से, दोस्तों से, प्यार से कि वो मेरे लिए सबसे ज़्यादा महत्व रखते हैं। मुझे लगा की यह कहा नहीं जाना चाहिए। बस सिर्फ इस बात की चुप्पी हमेशा खलती है। मैं भगौड़ा था, पैदाइशी भगौड़ा। मैं अपनी नाकामियों, कमज़ोरियों से हमेशा भागा ठीक उसी तरह लोगों से नहीं भाग पाया। किस्सों की गंभीरता, आंखों में क़ैद आँसू, चुप्पी और एक भगौड़े की नाकामी दिन-व-दिन बढ़ रही है।

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