मैं बहुत खुश हुआ जब मैंने अपने एकांत में उसे साथ पाया। यह कितना अजीब था | एक साल पहले तक हम अंजान थे एक दूसरे को जानते तक नहीं थे और आज मेरे साथ कोई ऐसा था जिसे मेरी परवाह थी। पहली बार मैं महसूस करता हूँ किसी का होना। ऐसा नहीं था कि मुझे प्यार करने वालों की कमी थी पर कुछेक समय पहले से किसी नए से चेहरे की तलाश थी। वो मुझे मिल गया। हम दोंनो बहुत अच्छे दोस्त बन गए पर कभी एक दूसरे को दोस्त नही कहा। कभी कभी लगता की हमारा रिश्ता अजीब ही होगा। मैं अपनी ज़िंदगी में कुछ अजीब होना सुखद महसूस करता हूँ। वक़्त के साथ हम इतने करीब हो गए कि एक दिन मैंने उसकी गोद में सर रख दिया और उसे कहा कि मुझे ज़ोर की नींद आ रही है। मैंने अपने अंदर छिपे तमाम राज़ उसे कह दिए। और फिर अचानक वो गायब हो गई..मैं छटपटा उठा, इतने इंतज़ार के बाद अभी तो वो मिली थी और कितनी और बातें उसे कहनी थी। फिर अचानक मुझे लगा की मैंने यह सब उसे क्यों कहा। क्या वो मेरी दोस्त है? प्रेमिका तो नहीं ही है, हाँ लगाव है शायद वो भी मेरे ही कारण। यह मैंने क्या कर दिया, कैसे अपने भीतर छिपे राज़ उसे कह दिए। क्या मैं हमेशा से ऐसा हूँ कि कोई मेरी परवाह करे या मुझसे लगाव रखे तो बिना उसे जाने समझे मैं उसे वे सब बातें कह दूंगा जो मेरे भीतर है। पर मैंने किसी और को भी तो कभी नहीं कहा सिर्फ उसे ही तो कहा। शायद परेशानी भी यही है कि उसे ही क्यों कहा। मैं हर मायने में उसे सोचता हूँ। ख़ुद को गलत ही पाता हूँ। शायद इस वज़ह से क्योंकि सभी शुरुआत मैंने ही की है। उसने कभी मेरी तरफ कदम नहीं बड़ाया। मेरा ही रुख़ उसकी और था। क्यों?, मैं ऐसा क्यों हूँ?, क्या सभी ऐसे है?, मतलब इस पूरी दुनिया में, कितने लोग है अनेकों चेहरे पर कोई एक ही आपकी स्मृति में बार बार क्यों आ जाता है? तब भी जब आप न चाहते हों। दरअसल, कभी कभी यह चाहना समझ नही आती। क्योंकि अगर वो आपकी स्मृति में है तो वो आपकी चाहत ही है। अब मैं एक रहस्य में उलझने लगता हूँ.. मैं उसके अलावा दुनिया की तमाम चीज़ों की कल्पना करता हूँ पूरे ब्रह्माण्ड को सोचता हूँ। उसकी व्यापकता को सोचता हूँ। हममें से कोई भी न के बराबर है। और किसी के होने से कोई फर्क़ शायद पड़ता होगा। ख़ुद में इस बारे में कुछ महसूस नही करता। फिर अचानक से वो मुझे छोड़कर जाने लगती है। मैं चीख़ने लगता हूँ आवाज़ नही निकलती। खट खट की आवाज़ लगातार मेरे कानों में गूँजती रहती है। मैं नींद से जागता हूँ। और मेरी ज़बान से निकलता है "यह क्या हो गया।", "जबकि कुछ हुआ ही नहीं।"
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