Wednesday, 27 May 2020

पाँच

"हम दोनों के बीच जो रास्ता है उसे भी तो हम दोनों ही समझ नहीं आते |" कल रात उससे बात शुरू ही की थी अचानक रुक गया। मन हुआ की अब कभी बात नहीं करूं। फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों सोचता हूँ? मतलब हम ख़ुद से भागकर कहाँ जायेंगे? और क्या ऐसे रास्ते बने भी है जिन्हें पार कर हम अपने से भाग जाएं। मैं तो सृजन की प्रिक्रिया में हूँ यानी ख़ुद को ढूंढ ही रहा हूँ। ख़ुद से भागना तो ख़ुद की तलाश नही होती शायद। कभी कभी अपनी यह मनोस्थिति समझ नहीं आती क्योंकि यह ख़ुद में विरोधाभास लिए हुए है। चाहने न चाहने का, भागने न भागने का, छुपने न छुपने का और हर तरह का। बहुत सोचने के बाद मुझे पता चला की मुझे किसी से भी डर नहीं लगता, किसी से भी। यह कुछ गलत सा अहसास है डर का न होना। कभी कभी लगता है कहीं मैं ठीक के आस पास तो नहीं। ओ शिट... मुझे ठीक शब्द से तो भयानक चिढ़ है जब मैं इसके आस पास भी कहीं होता हूँ तो लगता है की ख़ुद को डुबो दूं क्योंकि ये सुस्त सा अहसास दिलाता है। मैं आर या पार की लड़ाई लड़ना चाहता हूँ एक ही पल में, हमेशा। चाहता हूँ की तेरे लिए जब भी लडूं ख़ुद को तो हार ही जाऊं इस तरह बार बार हारना भी तो हर बार की बैचेनी है। शायद, बार बार या हर बार और कभी कभी का आना भी तो ठीक के आस पास कहीं होगा। मैं फिर से वहीं आ गया जहाँ खड़ा था यह क्या विडंबना है? कहीं ऐसा तो नहीं की हम दोनों में से कोई एक रहस्य हो अज़ीब सा या पहेली? मैंने जब उससे इस बात का ज़िक्र किया वो कहती है -"आप मुझे समझ नहीं आते।", "मुझे भी वो कहाँ समझ आती है", और हम दोनों के बीच जो रास्ता है उसे भी तो हम दोनों ही समझ नहीं आते। "दोनों न समझ है !"

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