Wednesday, 27 May 2020

दो

मैं जब अपने घर से निकला तो माँ की आँखों में देख रहा था । वो चाहती थीं की विरासत में मुझे इतना कुछ दे सके की ज़िन्दगी में मुझे कभी कोई तकलीफ़ न हो । मैंने कभी माँ से कहा नहीं पर मुझे उसकी लगन हमेशा दिखती थी और मैं उसे कहना चाहता था की विरासत में यह जो मुझे मिल रहा है वो सबसे बड़ा है । यह इतना भी हो सकता है की मैं दुनिया की कोई भी बाजी जीत सकता हूँ । पापा की ज़िद रहती है की वो हमेशा मुझे कुछ दे सकें। मेरे लिए कुछ कर सकें और एक किस्म की शिद्धत  हमेशा उनके भीतर रही है। आज कल में पता नहीं ऐसा क्या घट गया की महसूस हो रहा है की विरासत में वही शिद्धत मुझे मिल गई है । जिसके बूते मैं दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकता हूँ । मुझे अपने काम करने की शिद्धत पे घमंड हो गया है । मुझे अपने प्यार करने की शिद्धत पे घमंड हो गया है । घमंड और अकड़ बहुत विशेष लोगों में होती है। जिनके पास जीतने का जज़्बा होता है वही तो छाती ठोककर कह पाते होंगे की वे किसी दिन कर दिखाएंगे। मुझे जो चाहिए था शायद मिल गया है । मुझे विरासत में कोई धन दौलत या कोई भी भौतिकी तो कभी चाहिए ही नहीं थी । यही शिद्धत चाहिए थी जो है मुझमें । लेकिन कुछ है जो इस वक़्त मेरे भीतर बिखर गया है। जिसे समेटना मेरे अकेले के बूते की बात तो नहीं है। क्योंकि वो बिखरा हुआ मेरे अकेले का नहीं है । अपनी शिद्धत को मैं संभाल लूँगा पर मेरा घमंड नहीं टूटना चाहिए । मेरी अकड़ नहीं मरनी चाहिए । मैंने अब तक किसी भी असीम शक्ति पर भरोसा नहीं किया है लेकिन अगर वो है तो आज एक गुज़ारिश है उससे की अब से मैं अपनी शिद्धत को ही पालूँगा । पर जो बचाए रखना है वो बचा रहे । क्योंकि घमंड नहीं टूटेगा अगर कुछ टूटेगा तो वो मैं हूँ। शायद ये जीवन के सन्दर्भ में तो नहीं ही है। क्योंकि जीवन के हर उतार चढ़ाव को मैं बस जीना चाहता हूँ । यही मेरे जीवन की जीत है । और अपने सपनों के लिए भी घमंड या अकड़ का होना स्वाभाविक सा नहीं है । फिर ऐसा कुछ है जो न कहा जा सकता है, न लिखा जा सकता है !!  ये होना ठीक है या नहीं पर तय है । प्रेम पंख फैलाए मेरे कंधे आ बैठा है । पर उसका भार कभी कंधे पे महसूस नहीं होता । समझ नहीं आता की वो उड़ चुका है, बैठा है,  उड़न चाहता है या बैठना चाहता है । मैं तुम्हारा भार हमेशा अपने कंधे पर महसूस करना चाहता हूँ |

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