बचपन के दिनों में एक सपना बार बार आता था | बहुत डरावना सपना | न मैं चीख़ पाता था, न हिल डुल पाता था | लोगों को कहते सुना था की मैं म्य़ार के नीचे नहीं सोना चाहिए | मैं म्य़ार के एकदम नीचे सोता था | अगले दिन मुझे पता होता था आज फिर वही सपना आएगा पर मैं कुछ भी नहीं कर सकता था | मेरा काम था रात भर कॉफ़ खाना | उसे डरावने सपने से | वो सबसे अजीब सपना था क्यूँकी उसका कोई आकार नहीं था, मैं किसी को वो सपना बयाँ नहीं कर सकता था, उसकी शय ही कुछ ऐसी थी | आज भी मुझे उस सपने के अहसास है और आज भी मैं उस सपने को बयाँ नहीं कर सकता | उस सपने से झूझते झूझते में बड़ा होता गया और कई रातों के अभ्यास ने मुझे निशाचर बना दिया | मैं जो सोने के हज़ार प्रयास कर लूँ... पर एक तिहाई रात गुज़र जाती है मज़ाल है नींद मेरे तकिए को छु भी ले | उस सपने की सबसे खास बात यह थी की बड़ा होते होते मेरी जिंदगी में ऐसा कोई खौफ़ नहीं बचा जो मुझे डरा सके | उस सपने ने मुझे तमाम जगती रातें दी हैं, मैं इस फ़िराक में हूँ की रातों को क्या मानू? मैं सोने के प्रयास से थक गया हूँ | मैं सोना चाहता हूँ | क्या प्रेम का प्रयास 'प्रेम' हो सकता है? बिलकुल नहीं | मैं नहीं मानता | प्रेम का प्रयास और प्रेम, दो अलग बातें हैं | टूटने की आवाज़ भी नहीं आती इन दिनों | आहिस्ता आहिस्ता सब बिखर रहा है |